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भारत को मनाने के लिए अमेरिका ने बदला अपना रुख? ट्रंप के 100% टैरिफ टालने के पीछे की असली चाल क्या

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की योजना फिलहाल रोकना कई सवाल खड़े करता है. भारत समेत पांच देशों को इससे राहत मिली है. लेकिन क्या यह फैसला सिर्फ अमेरिका की ऊर्जा जरूरतों और घरेलू राजनीति का नतीजा है? या फिर ट्रंप प्रशासन भारत के साथ बिगड़ते रिश्तों को संभालना चाहता है? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले डेढ़ साल में भारत-अमेरिका संबंधों में कई बार तल्खी देखने को मिली. पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर हो या रूसी तेल खरीदने पर टैरिफ का दबाव. कई मौकों पर वॉशिंगटन का रुख नई दिल्ली को असहज करता रहा. अब अचानक टैरिफ की तलवार रोक दी गई है. ऐसे में क्या अमेरिका ट्रेड डील के लिए भारत को फिर से बातचीत की मेज पर लाना चाहता है?
अमेरिका में मिड टर्म चुनाव का दबाव है. ऊर्जा की कीमतें भी वहां बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती हैं. रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने से वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने का खतरा भी है. लेकिन भारत को मिली राहत को कूटनीतिक नजरिए से देखना गलत नहीं होगा. भारत अमेरिका के लिए बड़ा बाजार है. रक्षा सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी भी दोनों देशों के हित में है. ऐसे में टैरिफ रोकने का फैसला व्यापारिक राहत के साथ रिश्तों में तनाव कम करने का मौका हो सकता है.

पहलगाम से ऑपरेशन सिंदूर तक रिश्तों में क्यों आई खटास?

  • 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई. इसके जवाब में भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया और पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया. इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ा. संघर्षविराम की सहमति बनी तो ट्रंप ने भारत की आधिकारिक घोषणा से पहले ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसका ऐलान कर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि अगर दोनों देश नहीं रुके तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.
  • भारत ने साफ किया कि सैन्य कार्रवाई रोकने की सहमति दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधे संपर्क से बनी थी. नई दिल्ली ने किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के दावे को स्वीकार नहीं किया. इसके बावजूद ट्रंप बार-बार यह दावा करते रहे कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच बड़ा युद्ध रुकवाया. भारत के लिए यह सिर्फ बयान का मुद्दा नहीं था. यह भारत की संप्रभुता और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई पर अपना फैसला खुद लेने के अधिकार से जुड़ा सवाल भी था.
ट्रंप प्रशासन के कुछ दूसरे फैसलों ने भी भारत में सवाल खड़े किए. पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर को व्हाइट हाउस में बुलाना पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद खासा चर्चा में रहा. दूसरी ओर रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर टैरिफ का दबाव बनाया गया. व्यापार वार्ता में भी शुल्क और बाजार तक पहुंच को लेकर मतभेद सामने आते रहे. वॉशिंगटन एक तरफ भारत को रणनीतिक साझेदार बताता है तो दूसरी तरफ आर्थिक दबाव के जरिए उससे अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश करता दिखा. यही विरोधाभास दोनों देशों के रिश्तों में भरोसे की परीक्षा ले रहा है.

क्या ट्रेड डील के लिए नरम पड़ा अमेरिका?

रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की योजना फिलहाल स्थगित हुई है. भारत के अलावा चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को भी राहत मिली है. ट्रंप ने फैसले को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया है. ऊर्जा बाजार और घरेलू राजनीतिक दबाव इसकी वजह हो सकते हैं. लेकिन भारत-अमेरिका ट्रेड डील की बातचीत के बीच यह फैसला नई दिल्ली को राहत देने वाला जरूर है. हालांकि टैरिफ को स्थायी रूप से खत्म नहीं किया गया है. भविष्य में अमेरिका इसे फिर लागू करने का विकल्प रखता है. इसलिए इसे रिश्तों में पूरी तरह बदलाव का संकेत मानना जल्दबाजी होगी.

भारत के लिए सबक: राहत मिले लेकिन शर्तें बराबरी की हों

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा तकनीक, निवेश और व्यापार में सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं. लेकिन मजबूत साझेदारी दबाव और धमकियों के सहारे नहीं चल सकती. पहलगाम के बाद के घटनाक्रम से लेकर टैरिफ विवाद तक यह साफ हुआ है कि राजनीतिक दावे रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं. ट्रंप का ताजा फैसला ट्रेड डील की राह आसान करने का संकेत हो सकता है. मगर असली कसौटी यह होगी कि क्या अमेरिका व्यापार वार्ता में भारत के हितों का सम्मान करता है. भारत को बातचीत जारी रखनी चाहिए. लेकिन अपनी ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक स्वतंत्रता पर समझौता किए बिना. राहत अच्छी खबर है, पर उसके पीछे की मंशा को समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है.