इस फैसले ने वाशिंगटन में काफी खींचतान पैदा कर दी है. दोनों राजनीतिक दलों के सांसदों ने इस रोक की आलोचना की है. उनका तर्क है कि आर्थिक दबाव कम करने से मॉस्को की सैन्य फंडिंग को रोकने के पश्चिमी देशों के प्रयासों को कमजोर किया जा रहा है. मैसाचुसेट्स से डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने सीधे तौर पर ट्रम्प पर आरोप लगाया कि उन्होंने कांग्रेस की अनदेखी की है और रूस की आक्रामकता को बढ़ावा दिया है. उन्होंने सांसदों से इस फैसले को पलटने की मांग की. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि प्रतिबंधों में ढील देने से सीधे तौर पर रूस को फायदा होता है.
- तत्काल टैरिफ से राहत : भारत को अमेरिका के भारी अतिरिक्त टैरिफ और व्यापार प्रतिबंधों से कुछ समय के लिए राहत मिल गई है. नए कानून के तहत एक तय समय-सीमा के करीब आने पर ये प्रतिबंध लागू होने वाले थे.
ऊर्जा आयात पर राहत: रुबियो ने माना कि भले ही भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के लिए काम किया है, लेकिन वह अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाले बिना रातों-रात रूसी कच्चे तेल से पूरी तरह मुंह नहीं मोड़ सकता. इस छूट से भारतीय रिफाइनरियों को फिलहाल रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिल गई है. - ग्लोबल बाजार से तालमेल : अमेरिका का यह फैसला सप्लाई में आ रही व्यापक रुकावटों से काफी प्रभावित है. इनमें ईरान से जुड़े संघर्ष, सऊदी अरब के पास हूती हमले और यूक्रेन में चल रहा युद्ध शामिल है. इन हालात में रूसी तेल पर अचानक रोक लगाना ग्लोबल ईंधन की कीमतों के लिए बड़ा जोखिम भरा हो सकता है.
- लंबे समय की गारंटी नहीं : व्यापार विश्लेषकों और ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ का मानना है कि यह कोई स्थायी नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक अस्थायी और वापस ली जा सकने वाली राहत है. 60 दिनों की समीक्षा पूरी होने के बाद फिर से संकट आ सकता है.
- ट्रेड डील पर असर : यह कदम दिखाता है कि अमेरिका ने फिलहाल ग्लोबल ट्रेड को लेकर नरम रुख अपनाया है और इस छूट का असर भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर भी दिख सकता है.
भारत के लिए क्या है भविष्य
भारतीय रिफाइनरों के लिए यह कार्यकारी आदेश उन्हें बिना किसी तत्काल व्यापार दंड के रियायती रूसी तेल का आयात जारी रखने की अस्थायी छूट देता है. हालांकि, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) और उद्योग के अन्य विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यह राहत कोई दीर्घकालिक गारंटी नहीं देती है. इससे ऊर्जा आयातकों के सामने नीतिगत अनिश्चितता बनी रहेगी, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन के पास किसी भी समय निलंबित शुल्कों (टैरिफ) में बदलाव करने या उन्हें फिर से लागू करने का पूरा अधिकार है. जाहिर है कि इससे भारत को आने वाले समय में फिर से तेल आयात पर संकट का सामना करना पड़ सकता है.



