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क्या पेड़ बारिश बनाते हैं? पुनर्वनीकरण और जल संसाधनों के बीच छिपा वैज्ञानिक संबंध

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जल संकट का समाधान केवल बांध नहीं, वन भी हैं

बिलासपुर – यदि पृथ्वी से जंगल गायब हो जाएँ, तो क्या नदियाँ भी धीरे-धीरे गायब हो जाएँगी? यह प्रश्न सुनने में भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, लेकिन आधुनिक विज्ञान अब इस संभावना को गंभीरता से स्वीकार कर रहा है। लंबे समय तक वन संरक्षण को केवल जैव विविधता और कार्बन भंडारण से जोड़कर देखा जाता रहा। किंतु हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि वन वास्तव में पृथ्वी के जल चक्र के सबसे महत्वपूर्ण नियंत्रकों में से एक हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन ने यह स्पष्ट किया है कि पुनर्वनीकरण का प्रभाव केवल कार्बन अवशोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वर्षा, भूजल, नदियों और क्षेत्रीय जल सुरक्षा को भी प्रभावित करता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि पुनर्वनीकरण के जल संबंधी लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि वैश्विक तापमान कितना बढ़ता है और वृक्षारोपण किस पारिस्थितिक क्षेत्र में किया जाता है।

आज जब भारत सहित दुनिया के अनेक क्षेत्र जल संकट, सूखे और बढ़ते तापमान से जूझ रहे हैं, तब यह समझना आवश्यक है कि जंगल केवल प्रकृति की हरियाली नहीं, बल्कि जल सुरक्षा के प्राकृतिक इंजन हैं।

वन: पृथ्वी के प्राकृतिक जल टावर

वैज्ञानिक दृष्टि से वन एक विशाल जैव-भौतिक प्रणाली हैं जो जल के संचयन, वितरण और पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जब वर्षा होती है तो उसका पानी तीन प्रमुख मार्गों से गुजरता है—

1. सतह पर बहकर नदियों में जाता है।
2. मिट्टी में समाकर भूजल को पुनर्भरित करता है।
3. पौधों द्वारा अवशोषित होकर वायुमंडल में पुनः पहुँचता है।

वन इन तीनों प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। एक विकसित वन क्षेत्र वर्षा जल को स्पंज की तरह सोखता है। वृक्षों की जड़ें मिट्टी में असंख्य सूक्ष्म चैनल बनाती हैं, जिनसे जल गहराई तक पहुँचता है। परिणामस्वरूप भूजल पुनर्भरण बढ़ता है, सतही अपवाह कम होता है, बाढ़ की तीव्रता घटती है, और सूखे मौसम में भी नदियों का प्रवाह बना रहता है। इसी कारण वैज्ञानिक वनों को प्राकृतिक जल संरचना कहते हैं।

पेड़ कैसे बनाते हैं वर्षा?

यह तथ्य आश्चर्यजनक लग सकता है कि जंगल स्वयं भी वर्षा उत्पन्न करने में योगदान देते हैं। इसे वाष्पोत्सर्जन कहा जाता है। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिदिन 100–500 लीटर तक जल वायुमंडल में छोड़ सकता है। करोड़ों वृक्ष मिलकर वातावरण में इतनी नमी पहुंचाते हैं कि बादलों का निर्माण और वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।

अमेज़न से मिला महत्वपूर्ण प्रमाण

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार अमेज़न वर्षावन में होने वाली लगभग 50 प्रतिशत वर्षा स्वयं जंगलों द्वारा पुनर्चक्रित नमी से उत्पन्न होती है। इसी कारण अमेज़न को कभी-कभी उड़ती नदियों का स्रोत कहा जाता है।

जब वन नष्ट होते हैं:
– वायुमंडलीय नमी घटती है,
– बादलों का निर्माण कम होता है,
– वर्षा में कमी आती है,
– सूखे की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

यही प्रक्रिया विश्व के अनेक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में देखी जा रही है।

पुनर्वनीकरण: हर जगह समान लाभ नहीं

सामान्य धारणा है कि जितने अधिक पेड़ लगाए जाएँ, उतना अच्छा होगा। परंतु नवीन वैज्ञानिक अनुसंधान इससे अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। बताते हैं कि सही स्थान पर सही प्रजाति का वृक्षारोपण ही वास्तविक समाधान है। यदि वृक्षारोपण स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप न हो तो जल संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है।

कब पेड़ जल बचाते हैं और कब अधिक जल उपयोग करते हैं?

वनों के दो विपरीत प्रभाव हो सकते हैं।

सकारात्मक प्रभाव

– वर्षा बढ़ाना
– भूजल पुनर्भरण
– बाढ़ नियंत्रण
– मिट्टी संरक्षण
– स्थानीय तापमान में कमी

संभावित नकारात्मक प्रभाव

कुछ वृक्ष प्रजातियाँ अत्यधिक जल उपयोग करती हैं।

विशेष रूप से: यूकेलिप्टस,पॉपलर, कुछ विदेशी तेज़ी से बढ़ने वाली प्रजातियाँ। यदि इन्हें कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लगाया जाए तो:
– भूजल स्तर घट सकता है,
– नदी प्रवाह कम हो सकता है,
– स्थानीय जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए आधुनिक पुनर्वनीकरण केवल वृक्षारोपण नहीं बल्कि पारिस्थितिक अभियांत्रिकी का विषय बन चुका है।

जलवायु परिवर्तन और पुनर्वनीकरण का नया समीकरण

वैश्विक तापमान बढ़ने के साथ वर्षा की प्रकृति बदल रही है।

अब वर्षा:
– कम दिनों में अधिक हो रही है,
– बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं,
– सूखे अंतराल लंबे हो रहे हैं।

वैज्ञानिक इसे जल-संबंधी प्रक्रियाओं में तेज़ी कहते हैं। ऐसी स्थिति में वन वर्षा जल को रोकने और धीरे-धीरे भूमि में प्रवेश कराने का कार्य करते हैं। एक स्वस्थ वन क्षेत्र वर्षा की प्रत्येक बूंद का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करता है।

छत्तीसगढ़ के लिए यह अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

छत्तीसगढ़ भारत के सर्वाधिक वनाच्छादित राज्यों में से एक है। फिर भी राज्य अनेक जलवायु चुनौतियों का सामना कर रहा है जिसमें—

– ग्रीष्मकालीन तापमान में वृद्धि
– मानसून की अनिश्चितता
– गिरता भूजल स्तर
– सूखते तालाब और नाले
– कृषि उत्पादकता पर प्रभाव प्रमुख है।

ऐसी परिस्थिति में पुनर्वनीकरण को केवल हरित अभियान के रूप में नहीं, बल्कि जल सुरक्षा मिशन के रूप में देखना होगा।

छत्तीसगढ़ के लिए वैज्ञानिक पुनर्वनीकरण मॉडल

1. जलग्रहण आधारित वृक्षारोपण

जहाँ से जल बहकर निकलता है, वहाँ वृक्ष लगाने से जल धारण क्षमता बढ़ती है।

2. नदी तटीय वानिकी

अरपा, शिवनाथ, महानदी, इंद्रावती तथा हसदेव जैसी नदियों के किनारे हरित पट्टियाँ विकसित करना।

3. कृषि वानिकी

खेती और वृक्षों का एकीकृत मॉडल।

लाभ:
– अतिरिक्त आय
– कार्बन संचयन
– मृदा संरक्षण
– भूजल पुनर्भरण

4. खनन प्रभावित क्षेत्रों का पुनर्वास

कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में पुनर्वनीकरण जल संतुलन बहाल करने में सहायक हो सकता है।

5. स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता

महुआ, जामुन, अर्जुन, हर्रा, बेहड़ा, करंज, बाँस इत्यादि प्रजातियाँ स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप हैं तथा जल उपयोग दक्षता भी बेहतर रखती हैं।

वन: भविष्य की जल नीति का आधार

21वीं सदी में जल संकट केवल जल की कमी का प्रश्न नहीं है; यह पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का भी प्रश्न है।

नवीन वैज्ञानिक शोध स्पष्ट संकेत देते हैं कि:

– वन वर्षा को प्रभावित करते हैं।
– वन भूजल को पुनर्भरित करते हैं।
– वन तापमान नियंत्रित करते हैं।
– वन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करते हैं।

इसलिए आने वाले वर्षों में जल संरक्षण की चर्चा केवल बांधों, नहरों और जलाशयों तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें वनों और पुनर्वनीकरण को समान महत्व देना होगा।

मानव अस्तित्व के लिए वनों का होना आवश्यक

पुनर्वनीकरण केवल पेड़ लगाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जल, जलवायु और मानव भविष्य के बीच संतुलन स्थापित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आधुनिक शोध यह सिद्ध कर रहे हैं कि जंगल पृथ्वी के “हरे फेफड़े” ही नहीं, बल्कि उसके “प्राकृतिक जलाशय” भी हैं। यदि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हमें नदियों को जीवित रखना है, भूजल स्तर को सुरक्षित रखना है और कृषि को स्थायी बनाना है, तो हमें केवल अधिक पेड़ नहीं लगाने होंगे, बल्कि सही स्थान पर सही प्रजातियों के साथ वैज्ञानिक पुनर्वनीकरण अपनाना होगा। जहाँ वन सुरक्षित हैं, वहाँ जल सुरक्षित है; और जहाँ जल सुरक्षित है, वहीं मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर