उन्होंने आगे बताया कि होता क्या है, पहले के जो स्टांप पेपर हैं, वह तो प्रिंटेड आते थे. 25 हजार रुपये का होता था, फिर 15 हजार का होता था, 5 हजार का होता था. अब आजकल कंप्यूटर से जनरेटेड पेपर निकलता है. वह आप 1 रुपये का लेंगे तो भी वैसा ही दिखाई देगा. 1 करोड़ का लेंगे तो भी वैसा ही दिखाई देगा. ओरिजिनल और फोटोकॉपी में सब मात खा जाते हैं, क्योंकि उसमें सरकार का स्टांप नहीं होता है. सरकार के पोर्टल पर जाते हैं, स्टांप वेंडर वहां पर नाम रजिस्टर करते हैं और उसको प्रिंटआउट निकाल देते हैं. उसमें कुछ गड़बड़ियां हैं, जो कंप्यूटर वाले कर सकते हैं. आपने वही देखकर छोड़ दिया तो फिर आपके साथ चीटिंग हो सकती है.
कुणाल कांत शर्मा बताते हैं कि आप उस पेपर को लेकर किसी भी तहसील में, जिस तहसील की संपत्ति आप ले रहे हो, उस तहसील के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर प्रॉपर सरकारी फीस जमा कराकर उसका रिकॉर्ड चेक कर सकते हैं. जो कॉपी सेलर ओरिजिनल देगा, सेम वैसी ही कॉपी नीचे रिकॉर्ड में मिलेगी.
रजिस्ट्री से पहले प्रॉपर्टी पर किसी विवाद या केस की जानकारी कैसे लें, इस पर एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा बताते हैं कि उस विवाद और केस की जानकारी वैसे आप ऑनलाइन चेक कर सकते हैं. लेकिन ज्यादा तो यही है कि आपको सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर पता चलेगा. मानकर चलो यदि किसी आदमी ने उस प्रॉपर्टी पर स्टे ले लिया. अब जो आदमी उसको खरीदेगा, उसको कैसे पता चलेगा कि वो स्टे है. जिस आदमी ने स्टे लिया होगा, वह सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर लिखवाएगा कि सर, मैंने इस संपत्ति पर कोर्ट से स्टे ले रखा है.
प्रॉपर्टी पर लोन या किसी तरह का बकाया है, यह कैसे पता किया जा सकता है, इस पर कुणाल कांत शर्मा बताते हैं कि अगर किसी ने लोन लिया होगा तो मैं आपको बता देता हूं. अगर वह कोई बैंक का लोन लेता है और अपनी प्रॉपर्टी को मॉर्गेज करवाता है. मॉर्गेज करवाने के साथ ही जितने भी उसके ओरिजिनल कागजात हैं, उसकी खुद की और उसकी पिछली चेन, जहां से वह प्रॉपर्टी चली है, वह सब ओरिजिनल बैंक के पास होते हैं. अगर वह ओरिजिनल पेपर देने में आनाकानी करे तो समझ लो वो प्रॉपर्टी कहीं न कहीं मॉर्गेज है.
ब्रोकर या बेचने वाले की बात पर भरोसा करने के बजाय खरीदार को खुद कौन-सी जांच करनी चाहिए, इस पर एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा बताते हैं कि सबसे पहले उससे आप फोटो कॉपी लीजिए. फोटोकॉपी नहीं देता है तो डॉक्यूमेंट का नंबर लीजिए और उसका आधार कार्ड लीजिए. सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में उसके रिकॉर्ड रूम में जांच कराइए, क्योंकि कोई भी डॉक्यूमेंट बनता है तो उसकी दो प्रतिलिपि बनती है. एक ओरिजिनल खरीदार को दे दी जाती है और एक जो होती है, रिकॉर्ड के लिए हमेशा रहती है.



