चीन से आई एक खबर ने पूरी दुनिया में बैंकिंग से जुड़े लोगों के कान खड़े कर दिए हैं. शी जिनपिंग की सरकार ने अपने बैंकिंग सिस्टम पर ऐसा ‘बुलडोज़र’ चलाया है कि देश के 670 बैंक अचानक ‘गायब’ हो गए हैं. ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) के विश्लेषण में जानकारी दी गई है. बंद हुए बैंक, चीन के कुल बैंकों का करीब एक-चौथाई है. सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था, रियल एस्टेट के ढहते साम्राज्य और बढ़ते कर्ज़ के बीच अचानक सैकड़ों बैंकों पर ताला लटकने से सवाल उठने लगे हैं कि क्या ड्रैगन का खज़ाना वाकई खाली हो रहा है, या फिर किसी बड़े आर्थिक संकट से निपटने को चीन कमर कस रहा है.
फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) के अनुसार, चीन ने अपने वित्तीय तंत्र की ‘सफाई’ के लिए एकीकरण और पुनर्गठन अभियान तेज कर दिया है. इसके तहत छोटे और ग्रामीण वाणिज्यिक बैंकों को बंद किया जा रहा है या फिर बड़े बैंकों में मिलाया जा रहा है. सरकार का मकसद कमजोर, घाटे में चल रहे और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे छोटे बैंकों को खत्म करके मजबूत और भरपूर पूंजी वाले वित्तीय संस्थान खड़े करना है. इन बड़े बैंकों पर सरकार के लिए निगरानी रखना आसान है.
इन बैंकों के बंद होने से आम जनता की गाढी कमाई डूबी नहीं है. इन बैंकों को दिवालिया घोषित करके बंद नहीं किया गया है, बल्कि इनका विलय किया गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि छोटे ग्रामीण बैंकों के ग्राहकों के खाते, उनकी जमा राशि और लोन अब बड़े बैंकों के पास ट्रांसफर किए जा रहे हैं. इसलिए जमाकर्ताओं का पैसा डूबा नहीं है.
क्यों कमजोर हुई बैंकों की नींव?
फिच की रिपोर्ट साफ बताती है कि छोटे और ग्रामीण बैंक चीन के पूरे वित्तीय ढांचे की सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हो रहे थे. इन बैंकों ने छोटे बिल्डरों, स्थानीय सरकारी एजेंसियों और स्थानीय कंपनियों को आंख मूंदकर भारी कर्ज़ बांट रखे थे. जब चीन का रियल एस्टेट सेक्टर औंधे मुंह गिरा, तो ये बैंक भी फंस गए. पहली छमाही में ग्रामीण बैंकों का एनपीए (NPL) बढ़कर 2.8% तक पहुंच गया. यह पूरे देश की 1.5% से लगभग दोगुना है. वहीं मुनाफा (Return on Assets) गिरकर महज़ 0.45% रह गया. अगर इन्हें समय रहते न समेटा जाता, तो ये छोटे बैंक स्थानीय स्तर पर बड़ा विस्फोट कर सकते थे.



