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रक्षा खरीद प्रक्रिया होगी अब फास्ट ट्रैक मोड पर, नहीं लटकेगी डील बढ़ेगी रफ्तार, समय पर मिलेंगे हथियार

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खरीद प्रक्रिया सबसे जटिल होती है. एक डील को शुरू होने से लेकर हथियार के आने तक का समय में सालों वक्त लग जाता है. इस लगने वाले वक्त के चलते देश की सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों में दिक्कते पेश आती है. अब आने वाले समय में यह दिक्कते पेश नहीं आने वाली. रक्षा मंत्रालय ने इस लंबा लगने वाले वक्त को कम करने की कवायद को आगे बढ़ा दिया है. रक्षा मंत्रालय का रक्षा खरीद परिषद ने खरीद के लिए नई गाइडलाइन को मंजूरी दे दी. अभी तक खरीद प्रक्रिया में अमूमन 2 से 3 साल का वक्त लगता है. इसे कम कर के 6 महीने तक किए जाने की कोशिश होगी. साथ ही फील्ड इवैल्यूएशन और कीमत पर मोलभाव में लगने वाले समय को भी कम करने की तैयारी है.

मौजूदा खरीद प्रक्रिया
जो प्रक्रिया अभी तक अपनाई जाती है उसमें सबसे पहले होता है RFI रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया जाता है. इसमें से इस बात का पता लगाता है कि किस तरह के सैन्य साजो सामान मौजूद है. असल में प्रक्रिया शुरू होती है AON यानी एक्सेपटेंस ऑफ नेसेसिटी जारी होने के बाद. इसमें सेना अपनी जरूरतों को रक्षा मंत्रालय के DAC यानी डिफेंस एक्यूजिशन काउंसिल यानी रक्षा खरीद परिषद के सामने रखती है. DAC की अध्यक्षता रक्षामंत्री करते है. मीटिंग में अपनी जरूरतों को बताया जाता है और वहा से हरी झंडी मिलने के बाद प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर शुरू होती है. इसके बाद सेना अपनी जरूरतों पर रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी करती है. इसमें तमाम कंपनियां अपने प्रोडक्ट के बारे में जानकारी देती है बिड करती है. इसके बाद शुरू होता है ट्रायल. जो भी कंपनी के उपकरण सेना की जरूरतों को पूरा करते है उन्हें शॉर्ट लिस्ट किया जाता है. फिर सील्ड लिफाफे में दी गई बिड खोली जाती है. इस बिड में जिस कंपनी की कीमत कम लगाई होती है यानी की लोएस्ट बिड L1-L2 होती है, उसे डील के लिए चुना जाता है. इसके बाद शुरू होती है कीमत पर मोलभाव. इसे कॉस्ट निगोसियेशन कमेटी (CNC) आगे बढ़ाती है. एक बार कीमत तय हो जाने के बाद फिर आखिरी मुहर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की केन्द्रीय कैबिनेट (CCS) लगाती है. इसके बाद जाकर कहीं डील पर दस्तखत होते हैं.

लंबी लटकी रही डील
भारतीय वायुसेना कम होते फाइटर स्क्वॉड्रन से जूझ रहा है. विदेशों से नई जेनेरेशन के एयरक्राफ्ट भी लिए जाने हैं. लेकिन जानकर यह हैरानी जरूर होगी कि इस खरीद की प्रक्रिया आज नहीं बल्कि साल 2001 को MMRCA यानी मीडियम म्लटीरोल कॉंबेट एयरक्राफ्ट के तौर पर शुरू किया गया था. कुल 126 फाइटर की खरीद प्रक्रिया शुरू की गई थी. 2001 में RFI यानी रिक्वेस्ट ऑफ इंफॉर्मेशन जारी की गई थी. साल 2005 में जो RFP यानी रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोजल जारी किया जाना था वो साल मार्च 2007 में जारी हुआ.इसी साल जून में DAC ने इस खरीद को मंजूरी दी और प्रक्रिया अपने अगले चरण यानी टेंडर जारी होने में 6 महीने का और वक्त लग गया. आखिरकार 2008 में टेंडर जारी हो गया. दुनिया की 6 बड़ी कंपनी ने इस डील के बिड किया. इसमें अमेरीकी बोइंग F-18, लॉकहीड मार्टीन F-16, फ्रांस का रफाल, यूरोप का यूरोफाइटर टाइफून, रूस का मिग 35 और स्वीडन का ग्रिपन शामिल था. 2009 से ट्रायल शुरू हो गया. साल 2010 में जाकर ट्रायल भी खत्म हो गए. भारतीय वायुसेना ने यूरोफाइटर टाईफून और फ्रांस के रफाल को शॉर्ट लिस्ट किया. साल 2012 मे लोएस्ट वन के आधार पर बाजी मारी. इस 126 एयर क्राफ्ट में से 18 फ्लाइवे कंडिशन में आने थे बाकी भारत में HAL में निर्माण होने थे. लेकिन समय के साथ साथ डील की कीमत 100 फीसदी बढ़ गई. जो डील 24000 करोड़ रूपये से शुरू हुई थी वह 90,000 करोड़ तक पहुंच गई. साल 2014 आ चुका था आम चुनाव का वक्त. एसे में डील पर दस्तखत नहीं हो सके. कीमतों के लेकर मामला लटकता रहा. साल 2014 में कॉस्ट निगोसियेशन कमेटी ने अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपनी थी. ठीक उससे पहले रफाल की कीमते 90,000 करोड़ रूपये से बढ़कर 106,000 करोड़ तक पहुंच गई. पीाएम मोदी फ्रांस गए और 36 रफाल की खरीद का एलान कर दिया. आखिरकार साल 2015 में तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर परिकार ने राज्यसभा में आधिकारिकर तौर पर डील को खत्म करने की जानकारी दी. 14 साल का लंबा वक्त भी लगा और एक भी एयरक्राफ्ट नहीं मिला. MMRCA अब MRFA मल्टी रोल फाइटर एयर क्राफ्ट की शक्ल मे वापस आ रहा है. इस डील के लिए 4.5 जेनेरेशन के कुल 114 फाइटर लिया जाना है.